हे पान प्रमाणित केलेले आहे.
| २६ | जणू देखणी कविताच ती... नेहमी मनात फिरणारी! | ९१ |
| २७ | बीजिंगने दिलेला मंत्र रूजतोय का समाजात? | ९५ |
| २८ | सूर्यकिरण पहिले पाऊल टेकते ते अरूणाचल | ९९ |
| २९ | सात बहिणींच्या तनामनापर्यन्त | १०२ |
| ३० | समुद्र आणि समुद्र | १०५ |
| ३१ | साद हिमशिखरांची... उंच उंच चढताना | १०८ |
| ३२ | रोहतांगच्या खिंडीत | १११ |
| ३३ | कुल्लई खोरे : देवभूमी | ११४ |
| ३४ | दशम्या धपाट्याच्या चवीची वेळा आवस | ११७ |
| ३५ | हरवलेला वसंत | १२० |
| ३६ | त्र्याण्णव वर्षाच्या तरुणाकडून उर्जा चेतवून घेतांना | १२३ |
| ३७ | आमच्यातलं माणूसपण कमी होतेय का? | १२६ |
| ३८ | माहेरचा खोपा | १२९ |
| ३९ | जून महिना आला की | १३२ |
| ४० | हे विठूराया | १३४ |
| ४१ | फुलता मळा सतत बहरत राहो | १३७ |
| ४२ | धोबीका कुत्ता | १४० |
| ४३ | संक्रांत... प्रकाशपर्व | १४२ |
| ४४ | अनाघ्रात समुद्रानुभव | १४४ |
| ४५ | तू ऐल राधा | १४७ |
| ४६ | श्रावण अंगणी | १५० |
| ४७ | अक्षरांना अर्थ देऊन | १५४ |
| ४८ | रंगवल्ली... रांगोळी | १५७ |
| ४९ | घट | १६० |
| ५० | आला श्वास, गेला श्वास... एक भास! | १६३ |
| ५१ | थंडी, थंडी ...थंडी | १६६ |
| ५२ | हे स्वरांनो गंध व्हा रे | १६९ |
रुणझुणत्या पाखरा / तेरा