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रामदासवचनामृत
| क्रमांक | पृष्ठ | |
| १६. | भुते संतांस बाधा करू शकत नाहीत. | २४ |
| १७. | देवांचे जाणीवरूपाने अस्तित्व. | २४ |
| १८. | ब्रह्मा, विष्णु, महेश, यांचे केवळ प्रवृत्तिरूपाने अस्तित्व. | २५ |
| १९. | अनृताचे प्राबल्य. | २६ |
| २०. | ब्रह्मांडापैलीकडील गोष्टी. | २६ |
| २१. | सृष्टिकर्त्यास ओळखणे हीच उपासना. | २७ |
| २२. | देव कोणास म्हणावें? | २८ |
| २३. | देह, आत्मा, आणि ब्रह्म यांचा संबंध. | ३२ |
| २४. | चारही आत्मे मिळून एकच होत. | ३३ |
| २५. | ब्रह्माचे स्वरूप. | ३४ |
| ३. साक्षात्कार. | ||
| २६. | देवाचे भजन कां करावें? | ३६ |
| २७. | या संसारयात्रेमध्ये देवाचा नफा पहावा. | ३८ |
| २८. | अध्यात्मप्राप्तीविषयीं देहाचा उपयोग. | ३९ |
| २९. | अंतकालची दुःस्थिति. | ४२ |
| ३०. | मृत्यूचे सामर्थ्य. | ४३ |
| ३१. | "सर्व सांडून शोधा मजला." | ४८ |
| ३२. | याच जन्मीं परमेश्वराचा साक्षात्कार होणे शक्य आहे. | ४९ |
| ३३. | बद्ध मनुष्याचे वर्णन. | ५० |
| ३४. | गुरूची आवश्यकता. | ५० |
| ३५. | "सद्गुरुकृपा तेचि किली." | ५३ |
| ३६. | देवापेक्षां गुरु श्रेष्ठ आहे. | ५४ |
| ३७. | "म्हणौनी सद्गुरु वर्णवेना । हे गे हेचि माझी वर्णना." | ५४ |
| ३८. | सद्गुरूचे लक्षण. | ५७ |
| ३९. | साधुलक्षण. | ५८ |
| ४०. | "जें त्रैलोकी नाही दान । तें करिती संतसज्जन." | ६३ |