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अनुक्रमणिका
| क्रमांक | पृष्ठ | |
| ४१. | संतसभावर्णन. | ६६ |
| ४२. | संत चमत्कार करीत नाहीत, देव संतांबद्दल चमत्कार करितो. | ६८ |
| ४३. | ज्ञान आणि सामर्थ्य. | ६९ |
| ४४. | शिष्यलक्षण. | ७० |
| ४५. | मोक्ष कसा मिळतो? | ७३ |
| ४६. | सत्त्वगुणलक्षण. | ७४ |
| ४७. | नाममहिमा. | ८० |
| ४८. | "उपासनेचा मोठा आश्रयो." | ८३ |
| ४९. | "परंतु तेथे भगवंताचें । अधिष्ठान पाहिजे." | ८३ |
| ५०. | ईश्वराबद्दल अहैतुक प्रेम. | ८४ |
| ५१. | श्रवणनिरूपण. | ८५ |
| ५२. | "निःशंक निर्लज्ज कीर्तन । करितां रंग माजे." | ८९ |
| ५३. | भक्तियुक्त काव्य हेच प्रासादिक काव्य होय. | ९१ |
| ५४. | कल्पना कशी मोडावी? | ९२ |
| ५५. | "निर्विकल्पास कल्पावें । कल्पना मोडे स्वभावे." | ९४ |
| ५६. | खोटें ध्यान व खरें ध्यान | ९४ |
| ५७. | साधकलक्षण. | ९७ |
| ५८. | सख्यभक्तिनिरूपण. | १०० |
| ५९. | आत्मनिवेदनभक्ति. | १०३ |
| ६०. | आत्मनिवेदन म्हणजेच आत्मज्ञान. | १०५ |
| ६१. | मुक्तिचतुष्टयनिरूपण. | १०६ |
| ६२. | जीवन्मुक्तलक्षण. | १०६ |
| ६३. | "साधन सोडितां होये । मुक्तपणे बद्ध." | १०९ |
| ६४. | "कुल्लाळ पावला राज्यपदवी । आतां रासभे कासया राखावी." | ११० |
| ६५. | साक्षात्कार झाला हे कशावरून ओळखावें? | ११२ |