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१. प्रासंगिक. |
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| क्रमांक |
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पृष्ठ
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| १. |
रामदासांचा शिवाजीस उपदेश. |
१
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| २. |
ब्राह्मणांच्या दुःस्थितीबद्दल रामदासांचे उद्गार. |
२
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| ३. |
रामदासांचे स्वतःच्या उपासनेचे वर्णन. |
३
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| ४. |
रामदासांची रामभक्ति. |
४
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२. तात्त्विक. |
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| ५. |
ज्ञानाचे व्यतिरेकात्मक वर्णन. |
६
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| ६. |
ज्ञान म्हणजे काय? |
९
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| ७. |
आत्मज्ञानाच्या योगाने सर्व पातकांचा व दुःखांचा नाश होतो. |
१४
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| ८. |
मूर्ति म्हणजे देव नव्हे. |
१५
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| ९. |
नाना देव आणि एक देव. |
१७
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| १०. |
खरा देव म्हणजे मूर्ति नव्हे. |
१८
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| ११. |
देवांचा जो देव तो गुरूच्या योगानें कळतो. |
१९
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| १२. |
अंतरात्मा सर्व देवांहून श्रेष्ठ आहे. |
२०
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| १३. |
आत्मा हा सर्व देवांहून श्रेष्ठ आहे. |
२१
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| १४. |
देवता व भुते यांचे अस्तित्व. |
२२
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| १५. |
देवता वायुरूपाने राहतात. |
२३
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| क्रमांक |
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पृष्ठ
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| १६. |
भुते संतांस बाधा करू शकत नाहीत. |
२४
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| १७. |
देवांचे जाणीवरूपाने अस्तित्व. |
२४
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| १८. |
ब्रह्मा, विष्णु, महेश, यांचे केवळ प्रवृत्तिरूपाने अस्तित्व. |
२५
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| १९. |
अनृताचे प्राबल्य. |
२६
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| २०. |
ब्रह्मांडापैलीकडील गोष्टी. |
२६
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| २१. |
सृष्टिकर्त्यास ओळखणे हीच उपासना. |
२७
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| २२. |
देव कोणास म्हणावें? |
२८
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| २३. |
देह, आत्मा, आणि ब्रह्म यांचा संबंध. |
३२
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| २४. |
चारही आत्मे मिळून एकच होत. |
३३
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| २५. |
ब्रह्माचे स्वरूप. |
३४
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३. साक्षात्कार. |
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| २६. |
देवाचे भजन कां करावें? |
३६
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| २७. |
या संसारयात्रेमध्ये देवाचा नफा पहावा. |
३८
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| २८. |
अध्यात्मप्राप्तीविषयीं देहाचा उपयोग. |
३९
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| २९. |
अंतकालची दुःस्थिति. |
४२
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| ३०. |
मृत्यूचे सामर्थ्य. |
४३
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| ३१. |
"सर्व सांडून शोधा मजला." |
४८
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| ३२. |
याच जन्मीं परमेश्वराचा साक्षात्कार होणे शक्य आहे. |
४९
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| ३३. |
बद्ध मनुष्याचे वर्णन. |
५०
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| ३४. |
गुरूची आवश्यकता. |
५०
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| ३५. |
"सद्गुरुकृपा तेचि किली." |
५३
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| ३६. |
देवापेक्षां गुरु श्रेष्ठ आहे. |
५४
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| ३७. |
"म्हणौनी सद्गुरु वर्णवेना । हे गे हेचि माझी वर्णना." |
५४
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| ३८. |
सद्गुरूचे लक्षण. |
५७
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| ३९. |
साधुलक्षण. |
५८
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| ४०. |
"जें त्रैलोकी नाही दान । तें करिती संतसज्जन." |
६३
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| क्रमांक |
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पृष्ठ
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| ४१. |
संतसभावर्णन. |
६६
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| ४२. |
संत चमत्कार करीत नाहीत, देव संतांबद्दल चमत्कार करितो. |
६८
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| ४३. |
ज्ञान आणि सामर्थ्य. |
६९
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| ४४. |
शिष्यलक्षण. |
७०
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| ४५. |
मोक्ष कसा मिळतो? |
७३
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| ४६. |
सत्त्वगुणलक्षण. |
७४
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| ४७. |
नाममहिमा. |
८०
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| ४८. |
"उपासनेचा मोठा आश्रयो." |
८३
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| ४९. |
"परंतु तेथे भगवंताचें । अधिष्ठान पाहिजे." |
८३
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| ५०. |
ईश्वराबद्दल अहैतुक प्रेम. |
८४
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| ५१. |
श्रवणनिरूपण. |
८५
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| ५२. |
"निःशंक निर्लज्ज कीर्तन । करितां रंग माजे." |
८९
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| ५३. |
भक्तियुक्त काव्य हेच प्रासादिक काव्य होय. |
९१
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| ५४. |
कल्पना कशी मोडावी? |
९२
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| ५५. |
"निर्विकल्पास कल्पावें । कल्पना मोडे स्वभावे." |
९४
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| ५६. |
खोटें ध्यान व खरें ध्यान |
९४
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| ५७. |
साधकलक्षण. |
९७
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| ५८. |
सख्यभक्तिनिरूपण. |
१००
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| ५९. |
आत्मनिवेदनभक्ति. |
१०३
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| ६०. |
आत्मनिवेदन म्हणजेच आत्मज्ञान. |
१०५
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| ६१. |
मुक्तिचतुष्टयनिरूपण. |
१०६
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| ६२. |
जीवन्मुक्तलक्षण. |
१०६
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| ६३. |
"साधन सोडितां होये । मुक्तपणे बद्ध." |
१०९
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| ६४. |
"कुल्लाळ पावला राज्यपदवी । आतां रासभे कासया राखावी." |
११०
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| ६५. |
साक्षात्कार झाला हे कशावरून ओळखावें? |
११२
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| क्रमांक |
|
पृष्ठ
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| ६६. |
योग्यांच्या गुप्तधनाचे वर्णन. |
११३
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| ६७. |
अनुभवाचे उलट सुलट प्रकार. |
११५
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| ६८. |
"जैसा भाव जयापासी, तैसा देव तयासी." |
११६
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| ६९. |
परमार्थवर्णन. |
११६
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| ७०. |
प्रचीतिनिरूपण. |
११९
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| ७१. |
विमळब्रह्मनिरूपण. |
१२०
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| ७२. |
ब्रह्माचें सर्वगत अस्तित्व. |
१२५
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४. कर्मयोग. |
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| ७३. |
निःस्पृह वर्तणूक. |
१२७
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| ७४. |
उत्तमपुरुषनिरूपण. |
१२९
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| ७५. |
महंतलक्षणे. |
१३२
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| ७६. |
"जंव उत्तम गुण न कळे । तों या जनास काये कळे." |
१३३
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| ७७. |
शिकवणनिरूपण. |
१३४
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| ७८. |
विवेकनिरूपण. |
१३५
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| ७९. |
राजकारणनिरूपण. |
१३७
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| ८०. |
"कांहीं गल्बला काही निवळ । ऐसा कंठित जावा काळ." |
१४०
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| ८१. |
समर्थलक्षण. |
१४१
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| ८२. |
"भगवत्कीर्तीने भरावें । भूमंडळ." |
१४३
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| ८३. |
रामदासांचे आत्मचरित्र. |
१४५
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५. उपसंहार. |
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| ८४. |
"समर्थकृपेची वचनें । तो हा दासबोध." |
१४८
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