हे पान प्रमाणित केलेले आहे.
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रामदासवचनामृत
| क्रमांक | पृष्ठ | |||
| १२६. | एकही क्षण वायां न दवडितां देवाचें चिंतन. | २१० | ||
| १२७. | देवाचा वियोग नाहीं तो योग. | २११ | ||
| १२८. | देव एकाएकी प्रसन्न होतो. | २११ | ||
| १२९. | देवाचे सर्वत्र दर्शन. | २११ | ||
| १३०. | राघवाच्या भेटीने अमृतत्व. | २११ | ||
| १३१. | विठ्ठल व राम. | २१२ | ||
| १७. स्फुट प्रकरणे. | ||||
| १३२. | शक्ति व युक्ति | |||
| रामदासांची कविता ४३६. २२-५७ | २१३ | |||
| १३३. | देव व देउळे. | |||
| रामदासांची कविता ४३९. १-२२ | २१४ | |||
| १३४. | गुरुशिष्यसंवादात्मक दासबोधाचा सोंलीव अर्थ. | |||
| सोलीव अर्थ १५-३० | २१५ | |||
| १३५. | श्रीसमर्थकृत पांगूळ. | |||
| विविधविषय २. ८९ | २१७ | |||