R पद१८. (नाथ कैसे जगके बंद छुरावे त्या चालीवर २ नाथ कैसे सकट तृत्नाकर मारे॥ या पन मे आपही हारे ॥ ०॥ द्वादश दिन बिच आई ॥ स्तन डारे मुवमे विश्व शत ना। बीरव पिये और मानहि लीये ॥ सब गोकुल जन तारे ॥१॥ सका फरकों गपसी मान्यो ॥ तुम सबके रख बारे । बना करको कंठ पकरके ॥ देहसो प्रान निकारे ॥ २ ॥ येहिल - गन बिच पेजरची है ॥ आये बधूजन सारे ॥ छूटत नहि कंक नराधाको ॥ बैठे दीन बिचारे ॥ ३॥ राधा जूकी सखिया सया- नी॥ गारि देत तब दौरे ॥ याते कैसी राधा दीनी ॥ वोगोरीये- कोरे ॥ ४॥ मात जसोदा मनसकुचाई ॥ सबको तात तपसा- रे ॥ कोमल गात मेरे मोहनके ॥ देखो करहि बिघारे ॥ ५॥ प्रभुको क्रोध अयातब सनके ॥ छिनमे कंकन छोरे ॥ दीन दास सब सरन आये तब ॥ बिनती करत कर जोरे ॥ ६॥ ना० इति स्फुट प्रकरण संपूर्ण ॥ श्री सद्गुरु राधाकृष्ण चरणारविं दार्पणमस्तु १ सयानी म्हणजे शहाणी २ वा स्ट० ही. ३ कार म्हणजे काळे नि
पान:श्रीहरिदास गोविंद तारक गीत.pdf/८६
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